RBI का बड़ा फैसला: FD निवेशक क्या करें, पुरानी जमा पर मिलेगा पुराना ब्याज

Local Samachaar
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महंगाई को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की है। इसके बाद रेपो रेट 5.50% पर पहुंच गया है। इस फैसले के बाद बैंकिंग क्षेत्र में जमा और कर्ज की ब्याज दरों में बदलाव की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है। FD में निवेश करने वालों के लिए सबसे अहम सवाल है कि क्या उन्हें अब अधिक ब्याज मिलेगा और क्या पुरानी FD पर भी नई दर लागू होगी।

इसका जवाब बैंक की नीति और FD की शर्तों पर निर्भर करता है। रेपो रेट में बढ़ोतरी के बाद बैंक नई FD की दरें बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। किसी बैंक द्वारा दरें बढ़ाने की स्थिति में नई जमा कराने वाले ग्राहक को फायदा मिल सकता है।

पुरानी FD पर नहीं बढ़ेगा ब्याज?

यदि किसी ग्राहक ने निश्चित ब्याज दर पर FD कराई है, तो सामान्य तौर पर उस पर तय अवधि तक वही दर लागू रहती है। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने ₹1 लाख की FD 7% सालाना ब्याज पर कराई है। बाद में बैंक नई FD पर 7.25% ब्याज देने लगे, तो पुरानी FD की दर अपने आप 7.25% नहीं हो जाएगी।

ऐसे ग्राहक FD की मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम को नई दरों पर फिर से निवेश करने पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, यदि FD को समय से पहले बंद किया जाता है, तो बैंक की शर्तों के मुताबिक जुर्माना या ब्याज में कटौती हो सकती है।

FD से बेहतर रिटर्न पाने के तरीके

निवेशकों को अलग-अलग बैंकों की ब्याज दरों की तुलना करनी चाहिए। जमा की अवधि, समय से पहले निकासी, ब्याज भुगतान का विकल्प और टैक्स जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए उपलब्ध अतिरिक्त ब्याज दर की पात्रता भी जांची जा सकती है।

पूरी रकम को एक ही अवधि में जमा करने के बजाय जरूरत के अनुसार अलग-अलग मैच्योरिटी वाली FD पर विचार किया जा सकता है। इससे भविष्य में दरें बदलने पर निवेश के कुछ हिस्से को नई दर पर लगाने का अवसर मिल सकता है। यह रणनीति हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती; फैसला उसकी नकदी की जरूरत और वित्तीय लक्ष्यों पर निर्भर करेगा।

रेपो रेट बढ़ने का दूसरा पहलू

जहां FD निवेशकों को भविष्य में अधिक ब्याज मिलने की संभावना हो सकती है, वहीं फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की लागत भी बढ़ सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर बैंक और ग्राहक के बीच तय शर्तों पर निर्भर करेगा। इसलिए बचत और कर्ज दोनों की समीक्षा करना जरूरी है।

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