शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस वर्ष यह दिन मंगलवार, 13 अक्टूबर को पड़ रहा है। मां चंद्रघंटा का नाम उनके मस्तक पर सुशोभित घंटे के आकार वाले अर्धचंद्र के कारण पड़ा है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें साहस, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक माना गया है।
ऐसा है मां चंद्रघंटा का स्वरूप
धार्मिक चित्रण के अनुसार, मां चंद्रघंटा सिंह पर सवार रहती हैं और उनके अनेक हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुशोभित होते हैं। उनके स्वरूप में एक ओर ममता और शांति का भाव दिखाई देता है, तो दूसरी ओर अन्याय और नकारात्मक शक्तियों का सामना करने की क्षमता का प्रतीक भी मिलता है।
मां के मस्तक पर घंटे के समान अर्धचंद्र होने के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। भक्त उनकी पूजा कर मन में साहस, आत्मविश्वास और सकारात्मकता बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
महिषासुर से युद्ध की पौराणिक कथा
धार्मिक कथाओं के अनुसार, जब महिषासुर के अत्याचार बढ़ने लगे और देवता उससे परेशान हो गए, तब देवताओं की शक्तियों के तेज से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने देवी को विभिन्न दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। देवी ने महिषासुर के विरुद्ध युद्ध किया और अंततः उसका वध कर देवताओं को राहत दिलाई।
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना को इसी शक्ति और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के भाव से जोड़ा जाता है। यह कथा धार्मिक आस्था में बुराई पर अच्छाई की विजय और साहस के महत्व का संदेश देती है।
पूजा और मंत्र
इस दिन भक्त मां को पुष्प, धूप, दीप और सात्विक भोग अर्पित करते हैं। मां चंद्रघंटा के प्रचलित मंत्र का जाप किया जाता है:
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी की आराधना मन को स्थिर रखने और कठिन परिस्थितियों का सामना करने का संकल्प मजबूत करने की प्रेरणा देती है।

